हमारा सिरस
आज भी याद है....
बमुश्किल पचास बाय साठ की #गुवाड़ी लगभग चालीस घरों का बसेरा...... मेरे जैसे बीसेक टाबरों का झुण्ड अक्सर धमाचौकड़ी मचाया करता था....
बस्ती के सामने ही गांव का जाव (जहां लोग अक्सर कूड़ा डाला करते थे) हमारे लिए कुरड़ियों और बिटोड़ों के बीच खेल मैदान....
उसी खेल मैदान में खड़ा अटल सिरस का पेड़.... हमारे हर खेल और धमाचौकड़ी का गवाह और साथी भी... जाव को हमारी बस्ती के सामने कूड़ागाह बनाने का विशेष प्रयोजन हो सकता है पर इस निश्छल सिरस के यहां सबका स्वागत था.... याद है उसकी वो मुस्कान जब तीज पर उसकी शाख पर झूला डालकर झूलती थी कन्याएं और कभी कभी हमें भी बारी मिल ही जाती है...
दोस्त था हमारा.. कोई नेता से तुलना करे जी में आग सी उठती है...
पर वो आज नहीं है
बस याद बाकी है
"किरण कुमार "
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