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खूबसूरत जहाँ

मुसाफ़िर हूँ अनजान राहों का  घूमता रहा अनजानों में  कभी सहराओं में ,कभी पहाड़ों में  भीड़ में कभी , कभी वीरानों में  मैं खुद के अक्स को खोजता  भटकता रहा हमेशा बियाबानों में  वो दिखी एक मंद सी लौ  कहीँ दूर आसमानों में  शमां थी शायद उस अंधेरे खंडहर में  देखा जो उधर तो लगा  अंधेरा भीतर है मेरे खंडहर में नहीं  मगर तलाश पूरी हुई  वो शमां नहीं , शमाऐं थी  एक नहीं आठ थी  अंदर के अंधकार को मिटा गई  रोशनी सी भर गई  खाली जो था , भर गया  बस अब प्यार था , मोहब्बत थी  कुछ खिलखिलाते चेहरे  कुछ मुस्कुराते चेहरे  रंग बिरंगे  एक दूसरे को जगाते  और उनके बीच मैं  और हमारा खूबसूरत जहाँ 🥰😘😘

युद्ध खुद से

एक अंतर्द्वंद्व हर वक्त मेरे जेहन में  पिघलते फौलाद सा दौड़ता है  रगों में कुछ यूं बहता  जैसे नासूर से बहती लोहित मवाद। जिगर यूँ कि मांस का लोथड़ा  टपकती लहू की बूंदे उधड़े जिस्म से  जिस्म सीने के औजार कुछ खंजर से  कुछ घावों को चीर कर रफू किया  कुछ खुले रहे ,भिनभिनाती मक्खियाँ  खुली हैं ये आँखे टपकता है लहू  ये सपना है या हकीकत , नहीं जानता   बस ये खबर है  ये मैं तो नहीं हूँ  मैं तो था  ये मैं नहीं हूँ