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संग मैं हूँ !

जिंदगी जब तकलीफ दे  हालात मुश्किल हों  घुटने लगें सांसे हलक से निवाला ना उतरे  दिल पर हाथ रख  महसूस कर  उन धड़कन के संग मैं हूँ । पाँव डगमगाएँ कांपने लगे हाथ भी  लड़खड़ाए जुबान बोलते वक्त  निकले अल्फ़ाज़ महसूस कर  उन अल्फ़ाज़ों में संग मैं हूँ! जहाँ इम्तिहान लेने लगे  खुद की रूह नासाज़ हो  कुछ भी अपना सा ना लगे  घुल जाए फ़िज़ाओं में ज़हर  हवाओं को महसूस कर  खुशबू ना सही , टूटी सांस लौट आए  इतना सा संग मैं हूँ ।

लहूलुहान

अपने हाथ से  निकाला कलेजे को बाहर  खंजर मेरा ,कलेजा भी मेरा  चीर डाला  उतरा खून आँखों में बहुत  लहूलुहान थे हाथ मेरे  हाथ भी मेरे , खून भी मेरा  वो पड़ा उधर देख जमीन पर  कुछ तड़पता सा  धड़कन अभी मौजूद थी  मुझे देख रहा था कातर नजरों से  कह रहा था, कातिल है तू ... कत्ल भी मेरा ,गुनाह भी मेरा... तमाशबीन भी थे मौजूद वहाँ  कहा ! कौन है कातिल यहां  किसका यहां खून हुआ  मैंने कहा... कातिल मैं हूँ  और खून भी मेरा हुआ