आत्मश्लाघा का युग है ये,जहां देखो लोग परलोक से परे फेंकने का प्रयास करते नजर आते हैं। चूंकि मैं भी इसी दुनिया का रहवासी हूँ तो स्वाभाविक है में भी ऐसा ही हूँ।जब खुद के बारे म...
वो बरसी मैं रोया बहुत उसके आसुंओं ने मुझे भिगोया बहुत चले तीर प्रीत के उसने मुझे मैने उसे तरसाया बहुत वो भोर हुई मैं सांझ बना बस उस सपने ने हमें मिलवाया बहुत जी करता है सीने से लगा लूं उससे मिलने की चाह ने मुझे तड़पाया बहुत ✍️में ही 4:30
साथी ! ये अकेलापन नखों की फांस की तरह चुभता है मसखरे दिखाते है बेहद खुशियां अपने व्यंग्य में चलो कुछ दिन तो राहत मिली आजादी मिली पियेंगे जी भर के पार्टी करेंगे पर चुभते है सीने में ये व्यंग्य नश्तर बनकर कल जब तुम्हे याद किया बेचैनी में मुठियाँ भिंची दर्द के अहसास ने याद दिलाया नाखून काटने को तुम यहाँ नही हो साथी ! ये अकेलापन बहुत चुभता है
मैं अक्सर उनकी गली से गुजरता हूँ वो झिड़कती है दबा कर दाँतो को आंखे दिखाती है चले जाओ चले भी जाओ जाओ ना मैं उनकी ये ही झिड़की सुनने को अक्सर उनकी गली से गुजरता हूँ | मैं अक्सर उनकी गली से गुजरता हूँ वो चिल्लाती है धमकाती है मम्मी को बुलाती है कौन है ? अंदर से मम्मी पूछती है कोई नहीं मम्मा बिल्ली परेशान कर रही है जाओ ना प्लीज क्यो परेशान करते हो मैं नहीं करती तुमसे प्यार बस ये ही सुनने अक्सर उनकी गली से गुजरता हूँ
उसका भरोसा तोड़ने की सजा क्या होगी ? कैसी होगी ? डरता नहीं हूँ सजा से बस इंतजार है सजा मिले तो मुक्ति मिले उस दर्द से तकलीफ से उस सजा से जो खुद ही खुद को दे रहा हूँ | आँखे उसकी चमक...