बस स्मृतियां शेष हैं

एक निश्छल अटल वृक्ष के गहरी नींद में सो जाने की खबर ने आज अन्दर तक झकझोर दिया |
सरकारी सेवा की पहली कर्मस्थली सिरोही जिले का दुर्गम पहुँच वाला एक छोटा सा गाँव पांडव नगरी सनपुर जैसा यहाँ के स्थानीय निवासी कहते हैं, सनपुर के ठाकुर साहब श्री नारायण सिंह जी देवड़ा की निश्छल और विराट छवि बस याद बनके रह गई |
आज भी याद है वो पल मुझे जब एक विशाल और गबरू डील डोल वाले कक्षा आठ के लड़के देवेन्द्र पाल सिंह को उसकी गलती की वजह से मुर्गा बनाकर दण्ड दिया था स्टाफ के साथियों ने मुझे डराया अरे माट्स्साब क्या कर दिया आपने!!! ये ठाकुर साहब का पुत्र है और साथ ही ठाकुर साहब का उत्तराधिकारी भी | मन में शंका भी और एक अनजाना सा भय भी.... कैसे होंगे ये महानुभव !! देवेन्द्र के डील डोल देख कर ठाकुर साहब की कद काठी का अंदाज़ लगा के थोड़ा सिहर सा गया था... नई जगह... मैं भी नया... नई नौकरी... और घर से 800 किलोमीटर दूर अनजान जगह.... कहने का अर्थ मन में भय के सिवाय दूसरा कोई भाव ना था |
मन को समझाया... डरता क्यूँ है... कौन क्या कर सकता है... पर समझाने का प्रयास लगभग असफलता के सिवाय कुछ ना दे पाया | जैसे तैसे करके दिन बीत गया सुबह के इंतजार में !
सुबह हुई सातवीं क्लास में मेरा कालांश पर पढाने  में मन नहीं लग रहा बार बार नजरें स्कूल के मैन गेट की ओर...... लगभग छ: फीट से कुछ अधिक हाईट वाला सामान्य से धोती कुर्ते और पगड़ी वाला शख्स विद्यालय में प्रवेश करता है सुनिश्चित हो गया ये वो ही शख्स है जिसका मुझे इंतजार था...
एक बच्चा मेरी क्लास में आया.... सर्ररर हैडमाट्स्साब बुला रहें हैं आपको.... गया अंदर...... नमस्कार करण जी माट्स्साब.... शायद मेरा नाम उन्होने ये ही सुना था प्रत्युत्तर में नमस्कार से आगे कोई शब्द ना थे मेरे पास | का हुवौ माट्स्साब???
कुछ नहीं साहब बच्चा बदमाशी कर रहा था समझाने के लिए थोड़ी सजा दी थी!!
नहीं माट्स्साब गलती कीदी आप!!!
अण छोरै री गोड कूटणी थी अच्छे से... यहां गोड का मतलब उनका शरीर के नाजुक हिस्से से था जैसा कि मुझे बाद में साथियों ने समझाया |
खैर माहौल सामान्य हुआ खूब सारी औपचारिक और परिचयात्मक बातें हुई... समझ में आ गई बात.. इस विराट देह में विशाल हृदय है और शिक्षकों के प्रति अथाह सम्मान भी |
समय अपनी गति से बढ़ता गया और समय के साथ ठाकुर साहब से घनिष्ठता भी प्रगाढ़ता की पराकाष्ठा पार कर गई | ये घनिष्ठता एक बुजुर्ग और युवा की बेमेल सी दोस्ती में कब बदल गई पता ही ना चला | निकटता के अनगिनत किस्से बने जो मुझ जैसे आँकड़ो के शिक्षक के लिए शब्दों में बयां करना थोड़ा दुष्कर कार्य है |
मेरे पड़ौस में रहने वाले विक्रम टेलर के यहां अक्सर कुर्ता की सिलाई के लिए अक्सर आया करते थे और मैं सामंतशाही के मुद्दे पर उनसे बहस करता ही था... बहस का परिणाम चाहे जो रहे पर अंत में जानबूझ कर वो अपनी पराजय स्वीकार कर ही लेते थे | उस समय विजेता का भाव सुकून देता था पर आज उस भाव की स्मृति दिल में हूक सी पैदा करती है |
     समय बीता,  सामंतशाही के विरोधी होने का तमगा भी मिला परिणामस्वरूप प्रतिनियुक्ति का दर्द भी झेला पर वो अटल महामानव अटल ही रहा कभी मेरे विरूद्घ उसे खड़ा नहीं देखा और इसी अटलता ने मुझ से निष्ठुर को भी अपना फैन बना लिया |
कूका की चाय की दुकान !!
टूटी सी बैंच पर अक्सर उनके साथ चाय की चुस्कियां लेते कब शाम से रात हो जाती थी पता ही नहीं चलता था | सनपुर से छोटे गांव में ठाकुर साहब का यूं टूटी बैंच पर चाय पीना उनकी शान में गुस्ताख़ी मान लिया जाता था पर ठाकुर साहब इन तुच्छ बातों को तुच्छ ही मानते थे | उनकी सादगी सभी के लिए मिसाल थी |
उनकी शान में कुछ लिखना कम से कम मुझमें तो सामर्थ्य नहीं है |
   आज उनके दुनिया छोड़ने की दुखद घटना ने मुझ से पत्थर दिल को रूला दिया... मेरी आवाज उन तक तो शायद ना पहुँचे पर उनकी स्मृतियों को कलमबद्ध करके शायद अपनी निष्ठुरता का प्रायश्चित कर पाउँ |
                 📝 किरण कुमार

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