ये जख्म कुछ पुराना है

एक पुराने जख्म से कुछ रिस रहा है आज, मवाद मिश्रित रक्त का रंग कुछ मटमैलापन लिए हुए है और सड़ांध तो इतनी कि सांस लेना भी दूभर हो गया है|
घाव को नासूर बनाने से सम्बंधित फिल्मी संवाद नब्बे के दशक की लगभग हर तीसरी फिल्म में सुनने को मिलता था पर नासूर की परिभाषा के कयास लगते थे केवल,दिमाग की प्रखर धार भी कुंद हो जाती थी |
    ये कोई अस्सी के दशक का कोई साल था, पड़ौस के गांव में एक निजी स्कूल खुला,प्रचार भी हुआ कि अधिकतर शिक्षक यूपी से इम्पोर्टेड हैं| उन दिनों इम्पोर्टेड शिक्षकों पर गुणवत्ता का परिचायक माना जाता था| हालांकि गलत भी नहीं थे जी जान से मेहनत करते थे|
उसी दौरान एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार का बच्चा भी प्रवेश लेता है| पिताजी बमुश्किल हजार पन्द्रह सौ पगार वाली सरकारी नौकरी से अपने बच्चों को बेहतरीन भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं|
बच्चा मेधावी है और स्वभाव से थोड़ा संकोची| कक्षा की लगभग दूसरी लाईन में बैठना उसकी आदत है और कक्षाध्यापक जी ने भी उसकी आदत पर सहमति प्रदान कर ही दी है| समय बीतता गया,बच्चा अपनी काबिलियत और सीधेपन की वजह से सबका चहेता बन गया | अच्छे अंक लाना सम्मानित होना एक सामान्य बात हो गई थी |
जैसा सामान्यतया: निजी स्कूलों में होता है वहां भी हुआ,अंग्रेजी के अध्यापक बदल दिए गए|
लम्बी चौड़ी कद काठी के मालिक और दण्ड विधान तो ऐसा कि शास्त्रों के दण्डविधान भी दण्डवत हो जाए|
सामान्य गलती पर कनपटी के बाल उपर की ओर खींच कर बाल उड़ाना उनका अंदाज था| सीधी भाषा में कहूं तो बच्चो के लिए खौफ और अभिभावकों की नजर में एक आदर्श शिक्षक का पर्याय बन चुके थे| खैर होनी को कौन टाल सकता है उस सीधे बच्चे से भी गलती हो ही गई| अब गलती बड़ी थी तो दण्ड तो मिलना ही था और मिला भी| शरीर के नाजुक हिस्से पर नीले निशान उनके दण्डविधान का स्पष्ट प्रमाण दे रहे थे| अब गलती की है तो भुगतना ही है| एक लम्बी दण्ड प्रक्रिया के बाद बच्चे से पूछा व्हाट इज योर नेम?
सर सर... मा..... य नेम इज...... कुमार.... कांपती आवाज में जवाब दे ही दिया| बच्चे का पूरा नाम मुझे भी याद नहीं है और उस मनहूस नाम को याद करना भी नहीं चाहता|
पिताजी के नाम के बाद सीधा और महत्वपूर्ण प्रश्न किस जाति से हो ???? सर चमारां कै हूं... शायद बच्चे को चमारां कै कहने में चमार हूं से कम घिन्नता का अहसास हुआ होगा|
जा बेटा जा कोई बात नहीं... मुझे पता नहीं था.... मैने सोचा "@₹'"-+ होगा |
चमारां का छोरा के पढ्या करैं... हिन्दी से सीधे स्थानीय लहजे पर और आना ही था स्वभाविक प्रतिक्रिया सदैव मायड़ भाषा में ही निकलती है| 
गुरूजी ने अपना काम कर दिया... वो बच्चा बड़ा हो गया..... नई खेप तैयार कर रहा है... विषय के साथ जाति धर्म को कूड़े में डालने की सलाह के साथ....
अपने शिक्षक के प्रति सम्मान आज भी है.... पर प्रश्न खड़ा है वहीं के वहीं....
आज भी सजा को भूलकर डबडबाई आँखो से उस जगह को देख रहा है.... कानों में पिघले हुए शीशे को आज महसूस कर रहा है |
अरे कोई समझाए उस पागल बच्चे को... तू है ही इस लायक......
बस उसका दर्द मेरी आँखों से बह रहा है |
ढाई दशक पुराना दर्द रिस रहा है....

Comments