शर्मिंदा हूँ

एक नन्ही चिड़िया
पर भी ना उगे थे
सीख रही थी
चहचहाना

कुछ शिकारी
उन्मादक हौंसले
निर्भीकता
बेधड़क

रौंदा कुचला
मसला काटा
रूह ना कांपी
हैवानियत की हदें

ना उड़ पाई
ना भाग पाई
तड़पी तो होगी
रोई तो होगी

हैवान थे
इंसानियत जिंदा ना थी
कौन थे
क्यों थे
इसी धरती पर थे?

मौन था कोई
मैं भी तुम भी
चीख सुनी
बस चिड़िया की

बस और नहीं लिखा जाता
शर्मिंदा हूं
वो सीना ताने कहता है
हां जिंदा हूं
हां जिंदा हूं
📝किरण कुमार

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