सुहाना सफर
एक महीना हो गया तुझसे दूर रहते अब नहीं रहा जाता, मैं आ रहा हूँ प्रिये! उस पवित्र बंधन में बंधने के बाद ये पहला मौका है जब इतने लम्बे समय तक अलग रहे हैं |आज तुझे सरप्राइज जरूर दूंगा,शाम की बस में सीट बुक करवा दी है| अब बस घर पहुंचने की देर है,दो ड्रेस बैग में ठूंसी और ये उड़ा|
स्कूल से रवाना हो गया हूं,आज गाड़ी की रफ्तार कुछ तेज है वैसे स्टाफ के साथी मुझे स्लो ड्राइवर का तमगा दे ही चुके हैं| गाड़ी परवीन मामी के यहां पार्क करके उनके पास दो बात करने के लिए बैठ गया, आखिर वो मुझे सुनती भी हैं और समझती भी| उम्र का फासला बहुत अधिक नहीं है शायद इसीलिए वो मुझे बेहतर समझती हैं| उनसे विदा लेली और अब बस तैयारी|
सूरजगढ रेलवे फाटक पर चिड़ावा वाली बस का इंतजार कर रहा हूं और साथ ही भुट्टे बेचने वाले के साथ कुछ राजनैतिक गुफ्तगू भी| सामान्यत: भुट्टा मुझे पसंद नहीं है फिर भी उससे बात करके ऐसा लगा कि खरीदना चाहिए| बस आ गई, ठेलमपेल में बस में चढ गया और बस के केबिन के ठीक पास वाली तीन की सीट पर अधिकार जमा लिया, चिड़ावा चिड़ावा चिड़ावा.......की आवाज के साथ बस रवाना हो गई और कुछेक मिनट में टैगोर स्कूल के पास वाले स्टैण्ड पर बस रूकती है और एक लगभग तीसेक साल का नौजवान जो बस का कण्डक्टर है, बस से नीते उतरता है और सामान्य से कुछ ज्यादा समय बाद वापस बस में लौटता है| हाथ में एक लीटर कोका कोला बोतल कुछ डिस्पोजेबल गिलास और एक बीकानेरी भुजिया का दो सौ ग्राम वाला पैकेट है| मानव स्वभाव शंकालु होता है और मुझे भी उस बोतल में कोकाकोला के साथ कुछ और होने का पूरा शक है, और नमकीन का पैकेट इस शक को और बढा देता है|
खैर बस रवाना हो गई है ऩौजवान गिलासों में कोकाकोला(शायद) भरता है और ड्राइवर को देता है|केबिन में उनका हमउम्र एक नौजवान और है जो बातों से उनका बहुत करीबी है शायद| नमकीन का पैकेट भी खुल चुका है आपस में तीनों शेयर कर रहे हैं| अचानक बस का कंडक्टर तीसरे नौजवान को पैकेट में से थोड़ा नमकीन निकाल कर हाथ से देता है और नौजवान बिदक जाता है, भैन.... चो..... मैं कोई चमारां कै हूँ के!! पूरो पैकेट दे मैं खुद निकाळ के खाउंगो| मैं चेतना विहीन सा उनको देख रहा हूँ बस, मन में ज्वार तो उठा पर कुछ कहने की सामर्थ्य नहीं है| नौजवान मेरी तरफ एक हल्की मुस्कान के साथ देखता है, शायद मेरे ठीक ठाक वेशभूषा और सामान्य शक्ल सूरत होने से मुझसे अपनी गाली के संदर्भ में मौन स्वीकृति चाहता है| ये बुद्धिजीवियों का जिला है पर सोच कितनी कलुषित है,चमार शब्द इतना घृणित क्यों है?? हालांकि इन घटनाओं से बहुत बार पाला पड़ता है इसलिए बहुत जल्दी सामान्य हो गया हूँ|
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