वर्जनाएँ या डर?
गणतन्त्र दिवस आने वाला है, स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम की तैयारी चल रही है | सुनीता मैडम प्रभारी हैं और मोनिका मैडम उनकी खास सहयोगी | पीटीआई जी मार्च पास्ट की तैयारियों में मशगूल हैं | ग्राउंड से पुराने से ड्रम और सांस्कृतिक कार्यक्रम के स्पीकर की मिलीजुली कर्कश से कक्षाएँ लग पाना मुश्किल हो रहा है | वैसे मौसम भी ठण्डा है और हल्की धूप ने शिक्षकों के लिए चर्चा के लिए उपयुक्त माहौल बना दिया है |
आज राष्ट्रीय बालिका दिवस भी है, स्वभाविक है विचार विमर्श में ये विषय तो होगा ही | महिला शक्ति, नारी सशक्तीकरण, बालिका सुरक्षा, बढ़ती बलात्कार की घटनाओं और ऐसे ही अनेक मुद्दों पर गंभीरता से चर्चा हो रही है | कहते हैं कि जब वक्ताओं की संख्या ज्यादा हो तो मुद्दे से भटकाव निश्चित है, यहाँ भी ये ही हुआ | बालिका दिवस से कब शैक्सपीयर और जॉन डन की प्रेम कविताओं पर आ गए पता ही नहीं चला |
प्रेम वार्ताओं का सबसे नाजुक और प्रिय विषय सदा से रहा है | प्यार का नाम ही चेहरे पर मुस्कराहट लाने के लिए पर्याप्त टूल है |
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