क्या कहने

वो भोली अल्हड़ मुस्कानों के क्या कहने
खुलते मिचते पैमानों के क्या कहने
यूँ तो आँखे अलसाई थी उनकी आज
फना हुए इन परवानों के क्या कहने |

नूर कभी जो इस चेहरे पर दिखता था
चेहरा उनका उस पल खूब दमकता था
आज उदासी इस चेहरे पर दिखती है
शातिर कातिल शैतानों के क्या कहने |

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