बस मलाल

मैं जीना चाहता हूँ हर पल को, महसूस करना चाहता हूँ हर उस महक को, जो इन फिजाओं में घुली है | इन पलों को जब कोई चुरा ले या फिर कहूँ छीन ले तो मैं एक आम इंसान की तरह छटपटाता हूँ, रोता हूँ, खीजता हूँ, चिल्लाता हूँ और फिर अपनों से बात करके मन हल्का करता हूँ |
  हो सकता है मैं सबसे अलग नहीं हूँ पर मैं सबकी तरह अपने आवेश आवेग प्रवाह कुण्ठा या प्रेम को ज्यादा देर तक छुपा नहीं सकता |
प्रकटीकरण के अपनी तरह के नफे नुकसान हैं | आप लोगों की नजरों में खटकोगे किसी को पसंद आओगे, कोई जी भर के नफरत करेगा तो कोई आपको नाटकबाज की पदवी भी दे सकता है | हालांकि साफगोई से नजदीक आने वाले इंसान भी होंगे जो मेरी असल पूँजी पर मिले ब्याज से प्रिय होते हैं |
  अपने जॉब को एक बेहद कमजोर इंसान के रूप में शुरू किया,  और उस कमजोरी का फायदा बहुत से लोगों ने उठाया | वहाँ भी मेरे जेहन में एक डरपोक सा आम आदमी रहा | रॉबिनहुड बनने की ना तो कभी लालसा रही और ना ही कभी कोशिश की | जिन्दगी के थपेड़ों ने खूब गिराने की कोशिश की,  बर्बाद करने के प्रयास किए पर उन कठिन पलों में मेरी पत्नी मेरे बच्चे और मेरा परिवार हर पल एक परछाई की तरह मेरे संग रहे और हर विपदा से मुझे उबार लिया |
  सामान्यतः उम्र बढ़ने के साथ साथ व्यक्ति उर्जाविहीन होता जाता है,  कुण्ठित होता जाता है लेकिन मैं अपने आपको आज भी उर्जावान समझता हूँ |
  खैर मुद्दे पर आता हूँ,  कल सुबह से ही तरोताजा महसूस कर रहा था,  स्कूल में वार्षिकोत्सव जो था..
सामान्य दिनों से जल्दी उठा, रोजाना की मॉर्निंग वॉक निरस्त की और चिड़ावा से आवश्यक सामग्री खरीदी और तय समय पर पहुँच गया स्कूल |
चहकती चिड़ियाएँ और महकते पुष्प स्वागत में सज्ज ही थे और मुझे चाहिए ही क्या... मेरे ये उर्जा स्रोत मेरे पॉवर बैंक ही मेरे जीने की खास वजहों में से एक हैं...
इन चिड़ियाओं का चहकना मुझे एक नई उर्जा देता है और ऐसा एक भी मौका मैं जाया नहीं करता |
कल चहक और महक कुछ खास थी जो अंदर तक गुदगुदा रही थी...
गुड मॉर्निंग सर..... की आवाज भी एक ऐसा अहसास दिलाती है बस मैं भी बच्चा बन जाउँ.....
   अब इंतजार कुछ परेशान कर रहा था.. चंद साथियों के साथ कभी इधर कभी उधर.... बस व्यस्त दिखाने का प्रयास ही कर रहे थे वास्तव में तो कुछ काम था ही नहीं.
वार्षिकोत्सव प्रारम्भ होता है..... कुछ औपचारिकताओं के साथ जो प्रासंगिकताओं के ना होते हुए भी निभानी पड़ती हैं |
कंचन मैडम और महेन्द्र जी सामूहिक संचालन में कार्यक्रम शुरू होता है....
संचालन ऐन वक्त पर निर्धारित होता है यहाँ (या फिर स्थायी निर्धारित) देखकर नतमस्तक हो जाता हूँ...
परम्पराओं में थोड़ी ढ़ील देने से बच्चे अपने पसंदीदी गानो पर खुल कर खुशियाँ बटोर रहे हैं और मेरे लिए ये इस कार्यक्रम का इससे खास हासिल कुछ भी नहीं था..
साथी महेन्द्र जी मंच संचालन में अपने चिरपरिचित अंदाज में राजनीति विज्ञान के विज्ञ व्याख्याता नजर आए और मैडम में संचालन की क्षमताएं होते हुए भी अपनी हिन्दी व्याख्याता वाली शैली को छुपाते नजर आए.... इसे माइक का दोष दूँ या मेरी अपेक्षाओं का वजन...... खैर अच्छा निभाया |
  मेरी टीम के साथ गानों का लुत्फ ले रहा था.. कुछ चिड़ियाएं आती हैं और एक चुहल भरी आवाज में कहती हैं... सर!!
आप बोलेंगे ना हमारे लिए...
इस मासूम अनुरोध को नकार नहीं पाया और कह दिया... हाँ तुम्हारे कार्यक्रम में मैं ना बोलूं ऐसा हो सकता है क्या...
चेहरे चमक उठे...
कुछ मौलिक पँक्तियाँ बड़े जतन से तैयार की
क्यों कि मेरा वजूद ये बच्चें हैं इनके लिए जग से टकरा जाउं.....
ये दौलत हैं मेरी
मेरा अनमोल खजाना....
खैर समय की साजिश ने अपना काम किया और मैं प्यार बांटने से मरहूम रहा.... आँखो से अश्रुधार पर कंट्रोल किया....
उधर कहीं खाने का झगड़ा
खाना ले जाने का झगड़ा
खीर नहीं मिली
मास्टरों को क्यों नहीं मिली
बळन दो बच्चों को..
एक ऑलरेडी इरिटेट आदमी को और इरिटेट करने के लिए ये वाकये पर्याप्त थे |
अब खाने नाश्ते की इच्छाएं लगभग मर चुकी थी.. बस डैमेज कन्ट्रोल की कोशिश भर की.....
बच्चों के साथ थोड़ा बहुत प्यार बाँटा उनकी तकलीफ समझी और बांटी.......
खैर अभी तक निरूत्तर हूँ....
ये वार्षिकोत्सव था या विदाई पार्टी..
मुझे दोनो ही कम नजर आए....
साहब को पुन: बधाई...
विश्वास है आप तेज दिमाग से सब कुछ मैनेज कर लेंगे पर दिल में हुए रिक्त को भरना आपके बस की बात नहीं है |
साथियों को बधाई...
सबने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई.....
बस मैं अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पाया.....
मलाल रहेगा जिंदगी भर
कोसता रहूंगा ताउम्र

बस.......

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