एक इंसान

ना चाहत दुर्गा बनने की
ना दैवीय इच्छाएँ
वो इंसान है
इंसान बनी रहने दो |

झकझोरते हैं उसे
पूजा श्रद्धा और आरती से
विशाल शब्द
रोती है उसकी आत्मा
जब होता है बलात्कार
किसी दुर्गा का |

सरेराह नंगी होती है
आबरू किसी रणचंडी की
सिंहनी नौंची जाती है
भेड़ियों की भीड़ से |

वो देवी है
पर उपभोग की विषयवस्तु है
रौंदी जाती है
हर वक्त
हर पल

कहीं झाड़ियों में
नौंच रहे होते हैं भूखे श्वान
कहीं कत्ल होता है गर्भ में
उस दुर्गा का..

नहीं चाहिए आस्था
ना आराधना की लालसा
उसे चाहिए प्यार
उसका हक
और उसका जहाँ

#किरण कुमार

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