एक सैलाब

असमंजस बड़ा है
चेहरे पर मुस्कान है
जी में सैलाब है
चहकती चिड़ियाओं को
देखता हूँ
रूँधा गला
थरथराते होंठ
बस मुस्कुराता हूँ
या कहूँ
कोशिश भर करता हूँ |

महकते पुष्प
जगाते हैं अरमान
आसमान की परवान
अंतस से निकली धार
एक बाढ़ सी
बहा ले जाती है

दूर,  कहीं दूर
कहीं कंकड़
कहीं पत्थरों में
झाड़ झंखाड़ में उलझकर
लहूलुहान अरमान
फिर मुस्कुराते हैं
या कहूँ कोशिश भर करते हैं |

मरणासन्न हैं अभी
मरे नहीं हैं
जान है अभी
बाकी है जिजीविषा
फिर जगाने नए अरमान
फिर उठने को
फिर जागने को
एक नवजोश के साथ

किरण कुमार

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