बंधन बेनाम
वो हड़बड़ाई
माथे पर पसीने की कुछ बूँदे उभर आई
चेहरा सफेद
नजरें कातर
चेहरा घुमाया उस शख्स की ओर
जिस पर भरोसा खुद से ज्यादा
वो भी घबराया
पर अपनी घबराहट छिपाकर
मुस्कुराया
कहीं उसकी घबराहट से
वो बिखर ना जाए
खो ना जाए उसकी खिलखिलाहट
जो अनमोल है
इस डर से अपना डर छिपाया
वो चाहता तो पी लेता उसका डर
सीने से लगा लेता एक अबोध की तरह
बाँधा उसे बंधन ने
अदृश्य जंजीरों ने
चाहकर भी ना मुक्त कर पाया उसे
भय से
डर से
पर कौन है वो शख्स
ना रक्त का नाता
ना पुराना रिश्ता
बस एक कच्ची डोर से बँधा
एक नाजुक रिश्ता
हर पल डर
कहीं टूट ना जाए
कहीं बिखर ना जाए
कहीं दूर ना जाए
बेमेल रिश्तों का खूबसूरत अहसास
ये कहाँ खो गया
किस्सा डर का
जिक्र भय का
रिश्तों की बात कहाँ से
बंधन का अहसास कहाँ से
वक्त फिसलता जा रहा है
मुट्ठी से रेत की तरह
काश रुक जाता
कुछ पल
कुछ क्षण
बस तब तक
जब तक फिर एक डर होता
फिर वो घबराती
फिर वो घबराता
कुछ छिपाता
और फिर मुस्कुराता
बस मुस्कुराता
हाँ मुस्कुराता
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