मैं वैसी ही हूँ, जैसी थी

तुम कुछ महसूस होने लगी
दिल के उस कोने में
जो कुछ खाली सा था
मैंने उसको कहा !!
शायद हम भी
गुनगुनाते होंगे
तुम्हारे खाली मकाँ में
अरिजीत बनकर

वो मुस्कुराई
थोड़ा शरमाई
बदले भाव
नकार गई सिरे से
नहीं ऐसा नहीं
कुछ भी नहीं
वही हूँ
वैसी ही हूँ

कैसे नकारता
उसकी आँखों के प्यार को
उसके भरोसे को
उसके विश्वास को
पूछ ही लिया
पलटकर क्यों देखा
बस से उतरते ही
तुम्हे तो जाना था अपने शहर
तो तुम्हारी नजरें
क्या ढूँढ रही थी
क्या छोड़ गई थी मेरे पास

वो सकुचाई
चेहरे के भाव छुपाकर
मुस्कुराई
वो तो बस यूँही
लास्ट डे है कॉलेज का
ना जाने कब मिलेंगे फिर..

ओह थोड़ी जगह है
किसी कोने में??
ना मैं वैसी ही हूँ
जैसी थी....

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