साथी ये अकेलापन
साथी !
ये अकेलापन
नखों की फांस की तरह चुभता है
मसखरे दिखाते है बेहद खुशियां
अपने व्यंग्य में
चलो कुछ दिन तो राहत मिली
आजादी मिली
पियेंगे जी भर के
पार्टी करेंगे
पर चुभते है सीने में ये व्यंग्य
नश्तर बनकर
कल जब तुम्हे याद किया
बेचैनी में मुठियाँ भिंची
दर्द के अहसास ने याद दिलाया
नाखून काटने को तुम यहाँ नही हो
साथी !
ये अकेलापन बहुत चुभता है
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