कुसमयोजित इंसान
आत्मश्लाघा का युग है ये,जहां देखो लोग परलोक से परे फेंकने का प्रयास करते नजर आते हैं। चूंकि मैं भी इसी दुनिया का रहवासी हूँ तो स्वाभाविक है में भी ऐसा ही हूँ।जब खुद के बारे में बात करते हैं तो तो कमियां कम ही नजर आती हैं या कहूँ की नजर आती ही नहीं।
कहते है अपनी कमियों को जग जाहिर करने में बड़ा कंजूस होता है।बहादुर वो ही होता है जो अपनी कमियों को बाहर निकाल कर दुनिया के सामने रखे, आज कोशिश करता हूँ कि ये बहादुरी दिखाने का प्रयास करूँ हालांकि ये भी कुछ कुछ आत्मश्लाघा जैसा ही है।
इस खूबसूरत और समझदार दुनिया का बहुत ही कुसमयोजित इंसान हूँ मैं ।इसकी खूबसूरती से साथ कदमताल करने में हमेशा पिछड़ जाता हूँ , कोशिश करके भी साथ नही दे पाता हूँ।
अपने कार्य के प्रति समर्पित मानता हूँ लेकिन अपने कार्यक्षेत्र में बहुत सारा काम मिलने पर इरिटेट होता हूँ, झल्लाता हूँ,गुस्सा जाहिर करता हूँ और झल्लाहट में उस कार्य को पूरा करने की कोशिश भी करता हूँ । स्वाभाविक है इरिटेशन में किये गए काम में गलतियां भी होती हैं और आखिर में उन गलतियों को सुधारने की पहल भी करता हूँ। बहुत बार हंसी का पात्र भी बनता हूँ।
इसके उलट बहुत बार अपनी क्षमताओं से बहुत कम काम मिलने पर भी परेशान होता हूँ, हालांकि परेशान होने तक तो ठीक है पर अपनी परेशानी को प्रदर्शित करता हूँ। ये सब बातें किसी भी आम आदमी को कुसमयोजित साबित करने के लिए पर्याप्त हैं पर में अपने आप को कुसमयोजित घोषित करने की दौड़ में यहीं नही रुकता हूँ बल्कि लिमिट क्रॉस करने की पूरी कोशिश करता हूँ।
एक समायोजित इंसान में ये प्रवृति होती है कि दूसरों के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप नही करता है ,अपना काम पूरी मेहनत से करता है । दूसरों के काम में रही कमियों या गलतियों से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है और ना ही वो कोई विशेष प्रतिक्रिया ज़ाहिर करता है । मेरे अवगुणों में ये भी शुमार है, गलतियां नजर भी आती है और तन्मयता से उसे सुधारने का पूरा प्रयास करता हूँ, वो बात अलग है इस अनावश्यक प्रयास में पागल ही साबित होता हूँ।
एक सामान्य आदमी संयमित होता है पर संयम जैसा गुण प्रकृति ने मुझे दिया ही नहीं या फिर यूं कहूँ मैंने खुद इस गुण को बाहर निकाल फेंक दिया है। प्रेम प्रदर्शित करना हो ये अपना गुस्सा जाहिर करना हो त्वरित प्रतिक्रिया देता हूँ कभी ज़ेहन में विचार ही नही लाता कि मेरे प्रेम या गुस्से से किसी को क्या महसूस होता होगा, किसी को इरिटेशन भी होता होगा किसी को अनावश्यक दखलअंदाज़ी महसूस होती होगी । इन आवेगों के समय समायोजन की लिमिट पार कर ही जाता हूँ।
इस खूबसूरत दुनिया की खूबसूरत कृति इंसान जो समझदारी और बुद्धिचातुर्य से परिपूर्ण है। इंसान को इंसान की बहुत गहरी परख होती है और अपनी इस स्किल का प्रदर्शन भी इंसान वक्त बेवक्त करता ही है। इसी स्किल का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है किसी के चरित्र की पहचान करना।राह चलते इंसान की चारित्रिक कुंडली तैयार करने में इन बुद्धिजीवियों के पास महारथ हासिल होती है, वो बात अलग है कि ये प्रकांड विद्वान अपने आभामंडल में फैले अंधकार को जानबूझकर इग्नोर कर जाते हैं। मुझे इनकी विद्वता पर हमेशा खीज ही पैदा होती है क्योंकि मुझमें समायोजन की क्षमताओं की नितांत कमी है इसलिए इनकी प्रतिक्रिया दे कर इनकी आंखों में खटकता हूँ क्योंकि मैं इस खूबसूरत दिखने वाली दुनिया का एक बदसूरत और कुसमयोजित चेहरा हूँ।
बाकी अगली किश्त में
क्षमा सहित
आपका कुसमयोजित स्नेही
किरण कुमार
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