गलत कौन

सार्वजनिक चर्चाओं या बहस का मुख्य बिंदु होता है "गलती तुम्हारी,मैं सही हूँ।"इसी सही गलत की अनंत बहस की परिणति रिश्तों में खटास में होती है ।
सवाल बड़ा है कि गलत कौन लेकिन वास्तविक सवाल ये है कि सही कौन ,लेकिन हर चर्चा में ये दोनों ही प्रश्न अनुत्तरित रहते हैं और नतीजा होता है छींटाकसी, आरोप प्रत्यारोप या फिर संवादहीनता।
हर व्यक्ति चाहता है कि उसका स्वाभिमान बरकरार रहे लेकिन हम हर बार स्वाभिमान को परिभाषित करने में नाकाम रहते हैं, और स्वाभिमान attitude और ईगो को मिक्सअप कर तीनों की पहचान खो देते है और शेष कुछ बचता है तो वो है हमारा "मैं"और इसी मैं ने हमेशा रिश्ते बर्बाद किये है चाहे वो परिवार के हों या बाहरी दुनिया के ।

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