क्या खोया क्या पाया
दो दिन से चर्चाओं का अंबार है जन्माष्टमी का अवकाश क्यों बदल दिया गया। एक समूह खुश है कि उनकी बात को तवज्जो देकर सरकार ने अवकाश की तारीख़ बदल दी तो दूसरी समूह इस बात से खफा है कि उनकी बात क्यों मानी गई। तर्क भी दिए जा रहे हैं ,कोई धार्मिक पक्ष की बात कर रहा है तो आदेश की टाइमिंग पर सवाल उठा रहा है ।
खैर सबकी अपनी राय है अपनी विचारधारा है और वैसे भी संविधान ने हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है तो हमें उनकी आपत्ति पर सवाल नहीं उठाने चाहिए।
इस पहलू पर मेरा क्या विचार है ये बताने के लिए लिख रहा हूँ....
लगभग 14 साल से अधिक सरकारी शिक्षक के रूप में सेवाएं दे रहा हूँ और इस अंतराल में ये कह सकता हूँ कि बहुत कम छुट्टियां ली हैं।विशेष परिस्थितियों को छोड़ दूं तो ये कह सकता हूँ कि हर वर्ष सीएल तो लेप्स ही हुई हैं।
शिविरा पंचांग के अनुसार 24 को जन्माष्टमी का अवकाश निर्धारित था तो स्वाभाविक है दूसरे साथियों की तरह मैंने भी कुछ प्लानिंग कर रखी थी।
22 अगस्त को बच्चों की स्कूल से मैसेज आता है कि 23 को सुबह इस साल की पहली पीटीएम है।विचार आया नही जाऊंगा लेकिन फिर ये सोच कर जाने की प्लानिंग कर ली कि पहली पीटीएम है और बच्चों के लिए जाना चाहिए।
सोचा पीटीएम अटेंड करके 10 बजे तक अपने स्कूल पहुंच जाऊंगा ।
सुबह रोज की तरह चार बजे व्हाट्सएप्प देखा तो अवकाश में बदलाव का आदेश दिखा.......
मन में कुछ खास भाव नहीं आये
स्कूल से कुछ बच्चों के कॉल आये कुछ को कॉल करके छुट्टी की सूचना दी।
सुबह बच्चों के पास पहुंचा
छोटो बिटिया पापा को देख कर बड़ी खुश हुई
पीटीएम में गया
बच्चों के टीचर्स से मिला
बताया कि दोनों बेटियां फर्स्ट रैंक आई हैं
बच्चों को उपलब्धि पर सभी मां बाप को खुशी होती है
मुझे भी वैसा ही गर्व महसूस हुआ
पीटीएम के बाद पूरा दिन बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड किया
ईमानदारी से कहूं तो पूरे दिन अपना स्कूल जेहन में नहीं आया ।
ये कह सकता हूँ ये दिन सफल रहा
आप मुझ पर ये आरोप लगा सकते हैं कि अपनी स्कूल के बच्चों के प्रति समर्पित नहीं हूँ । लेकिन मैं इन आरोपों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं सोचता।
आज सुबह स्कूल के लिए रवाना होता हूँ कुछ बच्चों के कॉल आते हैं उनकी जिज्ञासा है कि आज भी छुट्टी है क्या....
पर नतीजा ये हुआ कि आज बहुत ही कम संख्या में बच्चे आये......
हालांकि इस स्थिति में भी कुछ विशेष परेशानी महसूस नहीं हुई
एक बार भी ऐसा नही लगा कि इस एक दिन में बच्चों का कितना नुकसान हो जाएगा ।
मैं अपनी क्षमताएं जानता हूँ और ये भी बखूबी जानता हूँ कि इस अतिरिक्त अघोषित अवकाश की क्षतिपूर्ति कैसे करनी है.....
या फिर यूं कहूँ कि एनुअल प्लान के अनुसार जितना काम अब तक करना था उससे ज्यादा कर चुका हूँ और भरोसा है *परिणाम आशातीत ही मिलेगा*
अब बात ये थी कि आज के टाइम को क्वालिटी टाइम कैसे बनाया जाए ....
इसके लिए मुझे कुछ करने की जरूरत ही नही पड़ी....
स्टाफ के साथियों के स्थायीकरण के उपलक्ष्य में शानदार पार्टी ऑर्गनाइज कर दी गई
साथी वरिष्ठ सहायक शक्तिजी के कंधों पर आयोजन की जिम्मेदारी थी और उन्होंने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया भी....
चिड़ावा से काजू काजू कतली सिके हुए राजभोग और पनीर और अन्य सामग्री आ गई
नए पुराने स्टाफ के साथी मेहमान और मेजबान की दोहरी भूमिका में थे या ये कहूँ की तिहरी भूमिका में थे क्योंकि कुक भी तो ये ही थे...
खैर खाने की खुशबू बड़ा परेशान कर रही थी
बड़ी मुश्किल से सैंकड़ों घंटे बीत जाने पर साढ़े बारह बजे और हम टूट पड़े...
हिसाब किताब अच्छे से पूरा किया
जिन साथीयों ने पार्टी दी उन्होंने भी जम के वसूल किया
और में भला पीछे क्यों रहता।
मुख्य बात ये है सामान्य दिनों में स्टाफ से अच्छे से बात नहीं हो पाती है होता है तो बस सुबह औपचारिक अभिवादन ....
लेकिन ऐसे मौकों पर सब साथ मिल कर बैठते हैं खुशियों का सम्प्रेषण होता हैं
मुस्काने बिखरती हैं
कुल मिलाकर अतिरिक्त ऊर्जा मिलती है
और आज मिली भी ......
स्टाफ के साथी भी खुश और बच्चे तो एक अतिरिक्त छुट्टी पाकर खुश होने ही थे ....
मतलब लगातार दूसरा दिन क्वालिटी टाइम वाला रहा ..
पहली बात तो बच्चों का कोई नुकसान हुआ नहीं और थोड़ा बहुत हुआ भी होगा तो ब्याज सहित क्षतिपूर्ति कर दी जाएगी
क्योंकि मुझे मेरे साथियों पर गर्व है और भरोसा है वो बेहतरीन करेंगे
आपका साथी
एक सामान्य शिक्षक जिसे बच्चों की खुशियां गुदगुदाती हैँ
#किरण कुमार
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