युद्ध खुद से

एक अंतर्द्वंद्व हर वक्त मेरे जेहन में 
पिघलते फौलाद सा दौड़ता है 
रगों में कुछ यूं बहता 
जैसे नासूर से बहती लोहित मवाद।
जिगर यूँ कि मांस का लोथड़ा 
टपकती लहू की बूंदे उधड़े जिस्म से 
जिस्म सीने के औजार कुछ खंजर से 
कुछ घावों को चीर कर रफू किया 
कुछ खुले रहे ,भिनभिनाती मक्खियाँ 
खुली हैं ये आँखे टपकता है लहू 
ये सपना है या हकीकत , नहीं जानता 
 बस ये खबर है 
ये मैं तो नहीं हूँ 
मैं तो था 
ये मैं नहीं हूँ 


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