खूबसूरत जहाँ
मुसाफ़िर हूँ अनजान राहों का
घूमता रहा अनजानों में
कभी सहराओं में ,कभी पहाड़ों में
भीड़ में कभी , कभी वीरानों में
मैं खुद के अक्स को खोजता
भटकता रहा हमेशा बियाबानों में
वो दिखी एक मंद सी लौ
कहीँ दूर आसमानों में
शमां थी शायद उस अंधेरे खंडहर में
देखा जो उधर तो लगा
अंधेरा भीतर है मेरे खंडहर में नहीं
मगर तलाश पूरी हुई
वो शमां नहीं , शमाऐं थी
एक नहीं आठ थी
अंदर के अंधकार को मिटा गई
रोशनी सी भर गई
खाली जो था , भर गया
बस अब प्यार था , मोहब्बत थी
कुछ खिलखिलाते चेहरे
कुछ मुस्कुराते चेहरे
रंग बिरंगे
एक दूसरे को जगाते
और उनके बीच मैं
और हमारा खूबसूरत जहाँ 🥰😘😘
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